तान्प्रेक्षमाणः सहसा निकृत्ता;न्निकृत्तभोगानिव पन्नगेन्द्रान् ।
लङ्केश्वरः क्रोधवशं जगाम; ससर्ज चान्यान्निशितान्पृषत्कान् ॥
तान्प्रेक्षमाणः सहसा निकृत्ता;न्निकृत्तभोगानिव पन्नगेन्द्रान् ।
लङ्केश्वरः क्रोधवशं जगाम; ससर्ज चान्यान्निशितान्पृषत्कान् ॥
अन्वयः
सहसा with force, निकृत्तान् broken down, निकृत्तभोगान् whose coils have been broken, पन्नगेन्द्रानिव like serpent Lords, तान् them, प्रेक्षमाणः seeing, लङ्केश्वरः Lord of Lanka, क्रोधवशम् overtaken by wrath, जगाम fallen down, अन्यान् other, निशितान् sharp, पृषत्कान् let go.M N Dutt
They suddenly severed like powerful serpents cut.off, Lanka's lord came under the away of passion, and discharged other whetted arrows.Summary
Seeing the arrows cut down with force broken pieces like coils of serpents, the Lord of Lanka overtaken by anger let go another sharp arrow.पदच्छेदः
| तान् | तद् (२.३) |
| प्रेक्षमाणः | प्रेक्षमाण (√प्र-ईक्ष् + शानच्, १.१) |
| सहसा | सहस् (३.१) |
| निकृत्तान् | निकृत्त (√नि-कृत् + क्त, ५.१) |
| निकृत्तभोगान् | निकृत्त (√नि-कृत् + क्त)–भोग (२.३) |
| इव | इव (अव्ययः) |
| पन्नगेन्द्रान् | पन्नग–इन्द्र (२.३) |
| लङ्केश्वरः | लङ्केश्वर (१.१) |
| क्रोधवशं | क्रोध–वश (२.१) |
| जगाम | जगाम (√गम् लिट् प्र.पु. एक.) |
| ससर्ज | ससर्ज (√सृज् लिट् प्र.पु. एक.) |
| चान्यान्निशितान् | च (अव्ययः)–अन्य (२.३)–निशित (√नि-शा + क्त, २.३) |
| पृषत्कान् | पृषत्क (२.३) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | न्प्रे | क्ष | मा | णः | स | ह | सा | नि | कृ | त्ता |
| न्नि | कृ | त्त | भो | गा | नि | व | प | न्न | गे | न्द्रान् |
| ल | ङ्के | श्व | रः | क्रो | ध | व | शं | ज | गा | म |
| स | स | र्ज | चा | न्या | न्नि | शि | ता | न्पृ | ष | त्कान् |