यदा भृशं तैर्निनदैर्महात्मा; न कुम्भकर्णो बुबुधे प्रसुप्तः ।
ततो मुसुण्डीमुसलानि सर्वे; रक्षोगणास्ते जगृहुर्गदाश्च ॥
यदा भृशं तैर्निनदैर्महात्मा; न कुम्भकर्णो बुबुधे प्रसुप्तः ।
ततो मुसुण्डीमुसलानि सर्वे; रक्षोगणास्ते जगृहुर्गदाश्च ॥
अन्वयः
प्रसुप्तः sleeping, महात्मा great soul, कुम्भकर्णः Kumbhakarna, भृशम् angry, तैः they, निनदैः roared, यदा that way, नबुबुधे not awakened, ततः then सर्वे all, रक्षोगणाः Rakshasas, तम् him, मुसुण्ठीः mallets, मुसलानि bars, गदाश्च and maces, जगृहुः hit.M N Dutt
When the high-souled Kumbhakarņa sleeping soundly did not awake at that terrific tumult, the Raksasas took up Bhusundis and maces.Summary
Kumbhakarna sleeping like that, could not be awakened. Angry Rakshasas roared and hit him with mallets and maces.पदच्छेदः
| यदा | यदा (अव्ययः) |
| भृशं | भृशम् (अव्ययः) |
| तैर् | तद् (३.३) |
| निनदैर् | निनद (३.३) |
| महात्मा | महात्मन् (१.१) |
| न | न (अव्ययः) |
| कुम्भकर्णो | कुम्भकर्ण (१.१) |
| बुबुधे | बुबुधे (√बुध् लिट् प्र.पु. एक.) |
| प्रसुप्तः | प्रसुप्त (√प्र-स्वप् + क्त, १.१) |
| ततो | ततस् (अव्ययः) |
| भुशुण्डीमुसलानि | भुशुण्डि–मुसल (२.३) |
| सर्वे | सर्व (१.३) |
| रक्षोगणास्ते | रक्षस्–गण (१.३)–तद् (१.३) |
| जगृहुर् | जगृहुः (√ग्रह् लिट् प्र.पु. बहु.) |
| गदाश्च | गदा (२.३)–च (अव्ययः) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | दा | भृ | शं | तै | र्नि | न | दै | र्म | हा | त्मा |
| न | कु | म्भ | क | र्णो | बु | बु | धे | प्र | सु | प्तः |
| त | तो | मु | सु | ण्डी | मु | स | ला | नि | स | र्वे |
| र | क्षो | ग | णा | स्ते | ज | गृ | हु | र्ग | दा | श्च |