तं शैलशृङ्गैर्मुसलैर्गदाभि;र्वृक्षैस्तलैर्मुद्गरमुष्टिभिश्च ।
सुखप्रसुप्तं भुवि कुम्भकर्णं; रक्षांस्युदग्राणि तदा निजघ्नुः ॥
तं शैलशृङ्गैर्मुसलैर्गदाभि;र्वृक्षैस्तलैर्मुद्गरमुष्टिभिश्च ।
सुखप्रसुप्तं भुवि कुम्भकर्णं; रक्षांस्युदग्राणि तदा निजघ्नुः ॥
अन्वयः
तदा then, उदग्राणि exited, रक्षांसि Rakshasas, भुवि on the ground, सुखप्रसुप्तम् happily sleeping, तंकुम्भकर्णम् that Kumbhakarna, शैलशृङ्गैः with rocks and trees, मुसलैः bars, गदाभिः maces, मुद्गरमुष्टिभिःच with fists, निजघ्नुः not got up.M N Dutt
Then the Raksasas, drawing near, smote Kumbhakarņa sleeping sweetly in the chest with mountain-peaks, maces and clubs.Summary
Then the excited Rakshasas could not wake up Kumbhakarna happily sleeping on the ground in spite of hitting with rocks and trees and their fists.पदच्छेदः
| तं | तद् (२.१) |
| शैलशृङ्गैर् | शैल–शृङ्ग (३.३) |
| मुसलैर् | मुसल (३.३) |
| गदाभिर् | गदा (३.३) |
| वृक्षैस्तलैर् | वृक्ष (३.३)–तल (३.३) |
| मुद्गरमुष्टिभिश्च | मुद्गर–मुष्टि (३.३)–च (अव्ययः) |
| सुखप्रसुप्तं | सुख–प्रसुप्त (√प्र-स्वप् + क्त, २.१) |
| भुवि | भू (७.१) |
| कुम्भकर्णं | कुम्भकर्ण (२.१) |
| रक्षांस्युदग्राणि | रक्षस् (१.३)–उदग्र (१.३) |
| तदा | तदा (अव्ययः) |
| निजघ्नुः | निजघ्नुः (√नि-हन् लिट् प्र.पु. बहु.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं | शै | ल | शृ | ङ्गै | र्मु | स | लै | र्ग | दा | भि |
| र्वृ | क्षै | स्त | लै | र्मु | द्ग | र | मु | ष्टि | भि | श्च |
| सु | ख | प्र | सु | प्तं | भु | वि | कु | म्भ | क | र्णं |
| र | क्षां | स्यु | द | ग्रा | णि | त | दा | नि | ज | घ्नुः |