स कुम्भकर्णं कुपितो महेन्द्रो; जघान वज्रेण शितेन वज्री ।
स शक्रवज्राभिहतो महात्मा; चचाल कोपाच्च भृशं ननाद ॥
स कुम्भकर्णं कुपितो महेन्द्रो; जघान वज्रेण शितेन वज्री ।
स शक्रवज्राभिहतो महात्मा; चचाल कोपाच्च भृशं ननाद ॥
अन्वयः
वज्री armed with thunderbolt, सः he, महेन्द्रः Mahendra, कुपितः enraged, कुम्भकर्णम् Kumbhakarna, वज्रेण at Indra, जघान hurt, शक्रवज्राभिहतः with thunderbolt, महात्मा great self, सः he, चचाल reeled, कोपात् in anger, भृशम् intense, ननाद च roared.M N Dutt
Thereat the great Indra, waxing wroth, smote Kumbhakarna with the whetted levin. And hit at with Sakra's thunder bolt, that high-souled (hero) shook, and in wrath set up roars.Summary
"Mahendra who was armed with thunderbolt got enraged and hurt Kumbhakarna with thunderbolt. He reeled and roared with the strike."पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| कुम्भकर्णं | कुम्भकर्ण (२.१) |
| कुपितो | कुपित (√कुप् + क्त, १.१) |
| महेन्द्रो | महत्–इन्द्र (१.१) |
| जघान | जघान (√हन् लिट् प्र.पु. एक.) |
| वज्रेण | वज्र (३.१) |
| शितेन | शित (√शा + क्त, ३.१) |
| वज्री | वज्रिन् (१.१) |
| स | तद् (१.१) |
| शक्रवज्राभिहतो | शक्र–वज्र–अभिहत (√अभि-हन् + क्त, १.१) |
| महात्मा | महात्मन् (१.१) |
| चचाल | चचाल (√चल् लिट् प्र.पु. एक.) |
| कोपाच्च | कोप (५.१)–च (अव्ययः) |
| भृशं | भृशम् (अव्ययः) |
| ननाद | ननाद (√नद् लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | कु | म्भ | क | र्णं | कु | पि | तो | म | हे | न्द्रो |
| ज | घा | न | व | ज्रे | ण | शि | ते | न | व | ज्री |
| स | श | क्र | व | ज्रा | भि | ह | तो | म | हा | त्मा |
| च | चा | ल | को | पा | च्च | भृ | शं | न | ना | द |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||