अन्वयः
यः he who, शत्रुम् enemy, अवज्ञाय knowing fully, आत्मानम् himself, नाभिरक्षति does not protect himself, सः he, अनर्थान् reverses, अवाप्नोतिहि attains, स्थानात् from position, व्यवरोप्यते च is dragged
M N Dutt
He that disregarding his foe, omits to guard himself, come by disasters and lose his place.
Summary
"He who knowing fully the actions of the enemy does not protect himself he attains reverses and is also dragged down from position."
पदच्छेदः
| यो | यद् (१.१) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| शत्रुम् | शत्रु (२.१) |
| अवज्ञाय | अवज्ञाय (√अव-ज्ञा + ल्यप्) |
| नात्मानम् | न (अव्ययः)–आत्मन् (२.१) |
| अभिरक्षति | अभिरक्षति (√अभि-रक्ष् लट् प्र.पु. एक.) |
| अवाप्नोति | अवाप्नोति (√अव-आप् लट् प्र.पु. एक.) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| सो | तद् (१.१) |
| ऽनर्थान् | अनर्थ (२.३) |
| स्थानाच्च | स्थान (५.१)–च (अव्ययः) |
| व्यवरोप्यते | व्यवरोप्यते (√व्यव-रोपय् प्र.पु. एक.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| यो | हि | श | त्रु | म | व | ज्ञा | य |
| ना | त्मा | न | म | भि | र | क्ष | ति |
| अ | वा | प्नो | ति | हि | सो | ऽन | र्था |
| न्स्था | ना | च्च | व्य | व | रो | प्य | ते |