ततो हरीणां तदनीकमुग्रं; दुद्राव शूलं निशितं प्रगृह्य ।
तस्थौ ततोऽस्यापततः पुरस्ता;न्महीधराग्रं हनुमान्प्रगृह्य ॥
ततो हरीणां तदनीकमुग्रं; दुद्राव शूलं निशितं प्रगृह्य ।
तस्थौ ततोऽस्यापततः पुरस्ता;न्महीधराग्रं हनुमान्प्रगृह्य ॥
अन्वयः
ततः thereafter, उग्रम् sharp, शूलम् pike, प्रगृह्य holding, हरीणाम् Vanaras, उग्रम् sharp, तत् that, अभीकम् rushed, दुद्राव uprooted, हनुमान् Hanuman, महीधराग्रम् mountain peak, प्रगृह्य seizing, आपततः obstructed, तस्य its, पुरस्तात् before, तस्थौ him.M N Dutt
Then grasping his sharpened spear, Kumbhakarņa darted against that terrific array of monkeys. And as he charged them, Hanuman armed with a mountain-peak, stood before him.Summary
Thereafter Kumbhakarna holding a sharp pike rushed towards Hanuman who uprooted a mountain peak and obstructed him placing it before him.पदच्छेदः
| ततो | ततस् (अव्ययः) |
| हरीणां | हरि (६.३) |
| तद् | तद् (२.१) |
| अनीकम् | अनीक (२.१) |
| उग्रं | उग्र (२.१) |
| दुद्राव | दुद्राव (√द्रु लिट् प्र.पु. एक.) |
| शूलं | शूल (२.१) |
| निशितं | निशित (√नि-शा + क्त, २.१) |
| प्रगृह्य | प्रगृह्य (√प्र-ग्रह् + ल्यप्) |
| तस्थौ | तस्थौ (√स्था लिट् प्र.पु. एक.) |
| ततो | ततस् (अव्ययः) |
| ऽस्यापततः | इदम् (६.१)–आपतत् (√आ-पत् + शतृ, ६.१) |
| पुरस्तान् | पुरस्तात् (अव्ययः) |
| महीधराग्रं | महीधर–अग्र (२.१) |
| हनुमान् | हनुमन्त् (१.१) |
| प्रगृह्य | प्रगृह्य (√प्र-ग्रह् + ल्यप्) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तो | ह | री | णां | त | द | नी | क | मु | ग्रं |
| दु | द्रा | व | शू | लं | नि | शि | तं | प्र | गृ | ह्य |
| त | स्थौ | त | तो | ऽस्या | प | त | तः | पु | र | स्ता |
| न्म | ही | ध | रा | ग्रं | ह | नु | मा | न्प्र | गृ | ह्य |