स वारिधारा इव सायकांस्ता;न्पिबञ्शरीरेण महेन्द्रशत्रुः ।
जघान रामस्य शरप्रवेगं; व्याविध्य तं मुद्गरमुग्रवेगम् ॥
स वारिधारा इव सायकांस्ता;न्पिबञ्शरीरेण महेन्द्रशत्रुः ।
जघान रामस्य शरप्रवेगं; व्याविध्य तं मुद्गरमुग्रवेगम् ॥
अन्वयः
तान् those, सायकान् arrows, वारिधाराःइव like torrents of water, शरीरेण into the body, पिबन् drank, सः he, महेन्द्रशत्रुः enemy of Lord Indra, उग्रवेगम् at great speed, तम् that, मुद्गरम् club, व्याविध्य whirling round, रामस्य Rama's, शरप्रवेगम् speed of arrows, जगाम arrested.M N Dutt
Drinking up in his body those arrows resembling a shower, the enemy of the great Indra whirling his mace possessed of fierce ventinence, put out the arrowy discharge of Rāma.Summary
The enemy of Lord Indra drank the arrows through his body and hurled his club at great speed whirling it round and round arrested the arrows of Rama.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| वारिधारा | वारि–धारा (२.३) |
| इव | इव (अव्ययः) |
| सायकांस्तान् | सायक (२.३)–तद् (२.३) |
| पिबञ् | पिबत् (√पा + शतृ, १.१) |
| शरीरेण | शरीर (३.१) |
| महेन्द्रशत्रुः | महत्–इन्द्र–शत्रु (१.१) |
| जघान | जघान (√हन् लिट् प्र.पु. एक.) |
| रामस्य | राम (६.१) |
| शरप्रवेगं | शर–प्रवेग (२.१) |
| व्याविध्य | व्याविध्य (√व्या-व्यध् + ल्यप्) |
| तं | तद् (२.१) |
| मुद्गरम् | मुद्गर (२.१) |
| उग्रवेगम् | उग्र–वेग (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | वा | रि | धा | रा | इ | व | सा | य | कां | स्ता |
| न्पि | ब | ञ्श | री | रे | ण | म | हे | न्द्र | श | त्रुः |
| ज | घा | न | रा | म | स्य | श | र | प्र | वे | गं |
| व्या | वि | ध्य | तं | मु | द्ग | र | मु | ग्र | वे | गम् |