स कुम्भकर्णस्य भुजो निकृत्तः; पपात भूमौ गिरिसंनिकाशः ।
विवेष्टमानो निजघान वृक्षा;ञ्शैलाञ्शिलावानरराक्षसांश्च ॥
स कुम्भकर्णस्य भुजो निकृत्तः; पपात भूमौ गिरिसंनिकाशः ।
विवेष्टमानो निजघान वृक्षा;ञ्शैलाञ्शिलावानरराक्षसांश्च ॥
अन्वयः
कुम्भकर्णस्य Kumbhakarna's, गिरिसन्निकाशः resembled a mountain, सःभुजः that arm, निकृत्तः severed, भूमौ on ground, पपात fell, विवेष्टमानाः turning round and round, वृक्षान् trees, शैलान् mountains, शिलावानरराक्षसांश्च mountains, Vanaras and Rakshasas, निजघान crushed.M N Dutt
That arm of Kumbhakarma, being severed, dropped inert on the earth, like a hill, and crushed trees and rocks and crags and monkeys and Raksasas.Summary
Kumbhakarna who resembled a mountain, his arm severed turning round and round fell on trees, mountains, Vanaras and Rakshasas crushing them.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| कुम्भकर्णस्य | कुम्भकर्ण (६.१) |
| भुजो | भुज (१.१) |
| निकृत्तः | निकृत्त (√नि-कृत् + क्त, १.१) |
| पपात | पपात (√पत् लिट् प्र.पु. एक.) |
| भूमौ | भूमि (७.१) |
| गिरिसंनिकाशः | गिरि–संनिकाश (१.१) |
| विवेष्टमानो | विवेष्टमान (√वि-वेष्ट् + शानच्, १.१) |
| निजघान | निजघान (√नि-हन् लिट् प्र.पु. एक.) |
| वृक्षाञ् | वृक्ष (२.३) |
| शैलाञ् | शैल (२.३) |
| शिला | शिला (२.३) |
| वानरराक्षसांश्च | वानर–राक्षस (२.३)–च (अव्ययः) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | कु | म्भ | क | र्ण | स्य | भु | जो | नि | कृ | त्तः |
| प | पा | त | भू | मौ | गि | रि | सं | नि | का | शः |
| वि | वे | ष्ट | मा | नो | नि | ज | घा | न | वृ | क्षा |
| ञ्शै | ला | ञ्शि | ला | वा | न | र | रा | क्ष | सां | श्च |