स कुम्भकर्णोऽथ विवेश लङ्कां; स्फुरन्तमादाय महाहरिं तम् ।
विमानचर्यागृहगोपुरस्थैः; पुष्पाग्र्यवर्षैरवकीर्यमाणः ॥
स कुम्भकर्णोऽथ विवेश लङ्कां; स्फुरन्तमादाय महाहरिं तम् ।
विमानचर्यागृहगोपुरस्थैः; पुष्पाग्र्यवर्षैरवकीर्यमाणः ॥
अन्वयः
अत then, सःकुम्भकर्णः Kumbhakarna, स्फुरन्तम् shaking, तम् his, महाकपिम् great Vanara, आदाय taking, विमानचर्यागृहगोपुरस्थैः through the roads of lofty mansions, पुष्पाग्य्रवर्षैः showered with flowers, अवकीर्यमाणः hailed by Rakshasas, लङ्काम् Lanka, विवेश entered.M N Dutt
In the meantime Kumbhakarņa entered Lankā with Sugrīva trembling, being honoured with the showering of beautiful flowers from the sky, the buildings on the main roads and the town-gate.Summary
Then Kumbhakarna taking the great Vanara who started to shake by then, entered Lanka through the roads of lofty mansions from where Rakshasas hailed showering flowers.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| कुम्भकर्णो | कुम्भकर्ण (१.१) |
| ऽथ | अथ (अव्ययः) |
| विवेश | विवेश (√विश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| लङ्कां | लङ्का (२.१) |
| स्फुरन्तम् | स्फुरत् (√स्फुर् + शतृ, २.१) |
| आदाय | आदाय (√आ-दा + ल्यप्) |
| महाहरिं | महत्–हरि (२.१) |
| तम् | तद् (२.१) |
| विमानचर्यागृहगोपुरस्थैः | विमान–चर्या–गृह–गोपुर–स्थ (३.३) |
| पुष्पाग्र्यवर्षैर् | पुष्प–अग्र्य–वर्ष (३.३) |
| अवकीर्यमाणः | अवकीर्यमाण (√अव-कृ + शानच्, १.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | कु | म्भ | क | र्णो | ऽथ | वि | वे | श | ल | ङ्कां |
| स्फु | र | न्त | मा | दा | य | म | हा | ह | रिं | तम् |
| वि | मा | न | च | र्या | गृ | ह | गो | पु | र | स्थैः |
| पु | ष्पा | ग्र्य | व | र्षै | र | व | की | र्य | मा | णः |