ततः स संज्ञामुपलभ्य कृच्छ्रा;द्बलीयसस्तस्य भुजान्तरस्थः ।
अवेक्षमाणः पुरराजमार्गं; विचिन्तयामास मुहुर्महात्मा ॥
ततः स संज्ञामुपलभ्य कृच्छ्रा;द्बलीयसस्तस्य भुजान्तरस्थः ।
अवेक्षमाणः पुरराजमार्गं; विचिन्तयामास मुहुर्महात्मा ॥
अन्वयः
बलीयसः being strong, तस्य his, भुजान्तरस्थः from the arms, महात्मा great, सः he, कृच्छ्रात् painfully, संज्ञाम् senses, उपलभ्य having gained, पुरराजमार्गम् royal path of the city, अवेक्षमाणः started looking, मुहुः bewildered, विचिन्तयामास started pondering.M N Dutt
Then that mighty-minded (Sugriva), caught in the arms of the powerful Räksasa, having with difficulty come to his senses and surveying around him the streets of the town bethought himself.Summary
(Sugriva) being strong and painfully gained senses, from the arms of the great Rakshasa, started looking at the royal path of the city. He was bewildered and started pondering this way.पदच्छेदः
| ततः | ततस् (अव्ययः) |
| स | तद् (१.१) |
| संज्ञाम् | संज्ञा (२.१) |
| उपलभ्य | उपलभ्य (√उप-लभ् + ल्यप्) |
| कृच्छ्राद् | कृच्छ्र (५.१) |
| बलीयसस्तस्य | बलीयस् (६.१)–तद् (६.१) |
| भुजान्तरस्थः | भुजान्तर–स्थ (१.१) |
| अवेक्षमाणः | अवेक्षमाण (√अव-ईक्ष् + शानच्, १.१) |
| पुरराजमार्गं | पुर–राजमार्ग (२.१) |
| विचिन्तयामास | विचिन्तयामास (√वि-चिन्तय् प्र.पु. एक.) |
| मुहुर् | मुहुर् (अव्ययः) |
| महात्मा | महात्मन् (१.१) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तः | स | सं | ज्ञा | मु | प | ल | भ्य | कृ | च्छ्रा |
| द्ब | ली | य | स | स्त | स्य | भु | जा | न्त | र | स्थः |
| अ | वे | क्ष | मा | णः | पु | र | रा | ज | मा | र्गं |
| वि | चि | न्त | या | मा | स | मु | हु | र्म | हा | त्मा |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||