तं प्रासमालोक्य तदा विभग्नं; सुपर्णकृत्तोरगभोगकल्पम् ।
तलं समुद्यम्य स वालिपुत्र;स्तुरंगमस्याभिजघान मूर्ध्नि ॥
तं प्रासमालोक्य तदा विभग्नं; सुपर्णकृत्तोरगभोगकल्पम् ।
तलं समुद्यम्य स वालिपुत्र;स्तुरंगमस्याभिजघान मूर्ध्नि ॥
अन्वयः
सःवालिपुत्रः that Vali's son, तदा then, विभग्नम् broken and fallen, सुवर्णकृत्तोरगभोगकल्पम् like the coils of the serpent, प्रासम् spear, आलोक्य beholding, तलम् palm, उद्यम्य raising, तुरङ्गमस्य at the horse, मूर्ध्नि at the head, तस्यजघान struck at.M N Dutt
Seeing the praśa broken in pieces, like a powerful snake severed by Suparna, Vāli's son, raising his hand, dealt a slap at the head of his (Narāntaka's) steed.Summary
Then Vali's son beholding the broken and shattered spear fallen like the coils of serpent, raised his palm and struck at the head of Naranthaka's horse.पदच्छेदः
| तं | तद् (२.१) |
| प्रासम् | प्रास (२.१) |
| आलोक्य | आलोक्य (√आ-लोकय् + ल्यप्) |
| तदा | तदा (अव्ययः) |
| विभग्नं | विभग्न (√वि-भञ्ज् + क्त, २.१) |
| सुपर्णकृत्तोरगभोगकल्पम् | सुपर्ण–कृत्त (√कृत् + क्त)–उरग–भोग–कल्प (२.१) |
| तलं | तल (२.१) |
| समुद्यम्य | समुद्यम्य (√समुत्-यम् + ल्यप्) |
| स | तद् (१.१) |
| वालिपुत्रस् | वालिन्–पुत्र (१.१) |
| तुरंगमस्याभिजघान | तुरंगम (६.१)–अभिजघान (√अभि-हन् लिट् प्र.पु. एक.) |
| मूर्ध्नि | मूर्धन् (७.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं | प्रा | स | मा | लो | क्य | त | दा | वि | भ | ग्नं |
| सु | प | र्ण | कृ | त्तो | र | ग | भो | ग | क | ल्पम् |
| त | लं | स | मु | द्य | म्य | स | वा | लि | पु | त्र |
| स्तु | रं | ग | म | स्या | भि | ज | घा | न | मू | र्ध्नि |