अथान्तरिक्षे त्रिदशोत्तमानां; वनौकसां चैव महाप्रणादः ।
बभूव तस्मिन्निहतेऽग्र्यवीरे; नरान्तके वालिसुतेन संख्ये ॥
अथान्तरिक्षे त्रिदशोत्तमानां; वनौकसां चैव महाप्रणादः ।
बभूव तस्मिन्निहतेऽग्र्यवीरे; नरान्तके वालिसुतेन संख्ये ॥
अन्वयः
अग्रवीर्ये of foremost among heroes, तस्मिन् his, नरान्तके Naranthaka, संख्ये in combat, वालिसुतेन by Vali's son, निहते killed, अथा and then, अन्तरिक्षे sky, त्रिदशोत्तमानाम् Devatas and gods of three worlds, वनौकसांचैव including Vanaras, महान् great, प्रणादः happiness, बभूव radiated.M N Dutt
On Narāntaka of exceeding prowess having been slain by Vali's son in battle, there arose a tremendous uproar in the firmament from the wood-rangers and the foremost of celestials.Summary
Naranthaka, the foremost of the heroes, having been killed in combat, the Devatas and gods of the three worlds experienced great joy.पदच्छेदः
| अथान्तरिक्षे | अथ (अव्ययः)–अन्तरिक्ष (७.१) |
| त्रिदशोत्तमानां | त्रिदश–उत्तम (६.३) |
| वनौकसां | वनौकस् (६.३) |
| चैव | च (अव्ययः)–एव (अव्ययः) |
| महाप्रणादः | महत्–प्रणाद (१.१) |
| बभूव | बभूव (√भू लिट् प्र.पु. एक.) |
| तस्मिन्निहते | तद् (७.१)–निहत (√नि-हन् + क्त, ७.१) |
| ऽग्र्यवीरे | अग्र्य–वीर (७.१) |
| नरान्तके | नरान्तक (७.१) |
| वालिसुतेन | वालिन्–सुत (३.१) |
| संख्ये | संख्य (७.१) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | था | न्त | रि | क्षे | त्रि | द | शो | त्त | मा | नां |
| व | नौ | क | सां | चै | व | म | हा | प्र | णा | दः |
| ब | भू | व | त | स्मि | न्नि | ह | ते | ऽग्र्य | वी | रे |
| न | रा | न्त | के | वा | लि | सु | ते | न | सं | ख्ये |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||