तान्यायुधान्यद्भुतविग्रहाणि; मोघानि कृत्वा स शरोऽग्निदीप्तः ।
प्रसह्य तस्यैव किरीटजुष्टं; तदातिकायस्य शिरो जहार ॥
तान्यायुधान्यद्भुतविग्रहाणि; मोघानि कृत्वा स शरोऽग्निदीप्तः ।
प्रसह्य तस्यैव किरीटजुष्टं; तदातिकायस्य शिरो जहार ॥
अन्वयः
ततो that, अग्निदीप्तः glowing like fire, सःशरः those arrows, अद्भुतविग्रहाणि wonderful shapes, तानि them, आयुधानि weapons, मोघानि unsuccessful, कृत्वा becoming, तस्य its, अतिकायस्य Atikaya's, किरीटजुष्टम् decked with crown, शिरः head, प्रगृह्य seizing, जहार severed.M N Dutt
But beating down all those weapons of wonderful forms, that arrow alive with flames, coming to the diadem-decked head of Atikāya, severed the same (in twain).Summary
This great arrow of Lakshmana glowing like fire rendered the weapons in wonderful shapes released by Atikaya unsuccessful and severed the head of Atikaya decked with a crown.पदच्छेदः
| तान्यायुधान्यद्भुतविग्रहाणि | तद् (२.३)–आयुध (२.३)–अद्भुत–विग्रह (२.३) |
| मोघानि | मोघ (२.३) |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ + क्त्वा) |
| स | तद् (१.१) |
| शरो | शर (१.१) |
| ऽग्निदीप्तः | अग्नि–दीप्त (√दीप् + क्त, १.१) |
| प्रसह्य | प्रसह्य (√प्र-सह् + ल्यप्) |
| तस्यैव | तद् (६.१)–एव (अव्ययः) |
| किरीटजुष्टं | किरीट–जुष्ट (√जुष् + क्त, २.१) |
| तदातिकायस्य | तदा (अव्ययः)–अतिकाय (६.१) |
| शिरो | शिरस् (२.१) |
| जहार | जहार (√हृ लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | न्या | यु | धा | न्य | द्भु | त | वि | ग्र | हा | णि |
| मो | घा | नि | कृ | त्वा | स | श | रो | ऽग्नि | दी | प्तः |
| प्र | स | ह्य | त | स्यै | व | कि | री | ट | जु | ष्टं |
| त | दा | ति | का | य | स्य | शि | रो | ज | हा | र |