तत्तस्य वाक्यं ब्रुवतो निशम्य; चुकोप सौमित्रिरमित्रहन्ता ।
अमृष्यमाणश्च समुत्पपात; जग्राह चापं च ततः स्मयित्वा ॥
तत्तस्य वाक्यं ब्रुवतो निशम्य; चुकोप सौमित्रिरमित्रहन्ता ।
अमृष्यमाणश्च समुत्पपात; जग्राह चापं च ततः स्मयित्वा ॥
अन्वयः
ब्रुवतः having spoken, तस्य his, वाक्यम् that word, निशम्य hearing, अमित्रहन्ता destroyer of enemies, सौमित्रिः Saumithri, चुकोप in anger, ततः then, स्मयित्वा not enduring, अमृष्यमाणः not able to tolerate, समुत्पपात went towards, चापम् sword, जग्राह took up.M N Dutt
Hearing his speech, that slayer of foesSumitrā's son, was fired with wrath. And not bearing him, he sprang forward disregarding his antagonist's words, and took up his bow.Summary
On hearing Atikaya, Saumithri the destroyer of enemies, became angry, not enduring and not able to tolerate went towards him taking a sword.पदच्छेदः
| तत् | तद् (२.१) |
| तस्य | तद् (६.१) |
| वाक्यं | वाक्य (२.१) |
| ब्रुवतो | ब्रुवत् (√ब्रू + शतृ, ६.१) |
| निशम्य | निशम्य (√नि-शामय् + ल्यप्) |
| चुकोप | चुकोप (√कुप् लिट् प्र.पु. एक.) |
| सौमित्रिर् | सौमित्रि (१.१) |
| अमित्रहन्ता | अमित्र–हन्तृ (१.१) |
| अमृष्यमाणश्च | अमृष्यमाण (१.१)–च (अव्ययः) |
| समुत्पपात | समुत्पपात (√समुत्-पत् लिट् प्र.पु. एक.) |
| जग्राह | जग्राह (√ग्रह् लिट् प्र.पु. एक.) |
| चापं | चाप (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| ततः | ततस् (अव्ययः) |
| स्मयित्वा | स्मयित्वा (√स्मि + क्त्वा) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त्त | स्य | वा | क्यं | ब्रु | व | तो | नि | श | म्य |
| चु | को | प | सौ | मि | त्रि | र | मि | त्र | ह | न्ता |
| अ | मृ | ष्य | मा | ण | श्च | स | मु | त्प | पा | त |
| ज | ग्रा | ह | चा | पं | च | त | तः | स्म | यि | त्वा |