ततस्तु राजानमुदीक्ष्य दीनं; शोकार्णवे संपरिपुप्लुवानम् ।
अथर्षभो राक्षसराजसूनु;रथेन्द्रजिद्वाक्यमिदं बभाषे ॥
ततस्तु राजानमुदीक्ष्य दीनं; शोकार्णवे संपरिपुप्लुवानम् ।
अथर्षभो राक्षसराजसूनु;रथेन्द्रजिद्वाक्यमिदं बभाषे ॥
अन्वयः
ततः then, दीनम् desperate, शोकार्णवे sea of sorrow, सम्परीपुप्लुवानम् immersed in, राजानम् Oh king, उदीक्ष्य submitted, रथर्षभः foremost of chariot riders, राक्षसराजसूनुः Rakshasa king's son, इन्द्रन्द्रजित् Indrajith, तम् him, इदंवाक्यम् these words, बभाषे spoke.M N Dutt
Thereupon, seeing the king afflicted, and sunk in a sea of sorrow, that foremost of carwarriors-son to the Räkşasa king—Indrajit, addressed (his sire), saying.Summary
Thereafter, seeing the desperate Rakshasa king immersed in a sea of sorrow, Indrajith, son of Ravana, foremost of the chariot riders, submitted as follows.पदच्छेदः
| ततस्तु | ततस् (अव्ययः)–तु (अव्ययः) |
| राजानम् | राजन् (२.१) |
| उदीक्ष्य | उदीक्ष्य (√उत्-ईक्ष् + ल्यप्) |
| दीनं | दीन (२.१) |
| शोकार्णवे | शोक–अर्णव (७.१) |
| संपरिपुप्लुवानम् | संपरिपुप्लुवान (√सम्परि-प्लु + , २.१) |
| अथर्षभो | अथ (अव्ययः)–ऋषभ (१.१) |
| राक्षसराजसूनुर् | राक्षस–राजन्–सूनु (१.१) |
| अथेन्द्रजिद् | अथ (अव्ययः)–इन्द्रजित् (१.१) |
| वाक्यम् | वाक्य (२.१) |
| इदं | इदम् (२.१) |
| बभाषे | बभाषे (√भाष् लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त | स्तु | रा | जा | न | मु | दी | क्ष्य | दी | नं |
| शो | का | र्ण | वे | सं | प | रि | पु | प्लु | वा | नम् |
| अ | थ | र्ष | भो | रा | क्ष | स | रा | ज | सू | नु |
| र | थे | न्द्र | जि | द्वा | क्य | मि | दं | ब | भा | षे |