न तात मोहं प्रतिगन्तुमर्हसि; यत्रेन्द्रजिज्जीवति राक्षसेन्द्र ।
नेन्द्रारिबाणाभिहतो हि कश्चि;त्प्राणान्समर्थः समरेऽभिधर्तुम् ॥
न तात मोहं प्रतिगन्तुमर्हसि; यत्रेन्द्रजिज्जीवति राक्षसेन्द्र ।
नेन्द्रारिबाणाभिहतो हि कश्चि;त्प्राणान्समर्थः समरेऽभिधर्तुम् ॥
अन्वयः
राक्षसेन्द्र Rakshasa king,तात् dear, यत्र there, इन्द्रजित् Indrajith, जीवति alive, मोहम् delusion, परिगन्तुम् to despair, न अर्हसि not give way, समरे in battle, इन्द्रारिबाणाभिहतः struck with arrows of Indra, कश्चित् indeed, प्राणान् life, अभिपातुम् strike, न समर्थःहि not capable.M N Dutt
O father, it does not behove you to be overcome with this excessive grief, inasmuch as, O lord of Nairtas, Indrajit yet breaths. Smite by the enemy of Indra, (Rāghava) can by no means save his life in encounter.Summary
"Dear king of Rakshasas! Do not give way to despair when Indrajith is alive. Indeed, struck by Indrajith's arrows in battle it is not possible for anyone to be with life."पदच्छेदः
| न | न (अव्ययः) |
| तात | तात (८.१) |
| मोहं | मोह (२.१) |
| प्रतिगन्तुम् | प्रतिगन्तुम् (√प्रति-गम् + तुमुन्) |
| अर्हसि | अर्हसि (√अर्ह् लट् म.पु. ) |
| यत्रेन्द्रजिज्जीवति | यत्र (अव्ययः)–इन्द्रजित् (१.१)–जीवति (√जीव् लट् प्र.पु. एक.) |
| राक्षसेन्द्र | राक्षस–इन्द्र (८.१) |
| नेन्द्रारिबाणाभिहतो | न (अव्ययः)–इन्द्र–अरि–बाण–अभिहत (√अभि-हन् + क्त, १.१) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| कश्चित् | कश्चित् (१.१) |
| प्राणान् | प्राण (२.३) |
| समर्थः | समर्थ (१.१) |
| समरे | समर (७.१) |
| ऽभिधर्तुम् | अभिधर्तुम् (√अभि-धृ + तुमुन्) |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | ता | त | मो | हं | प्र | ति | ग | न्तु | म | र्ह | सि |
| य | त्रे | न्द्र | जि | ज्जी | व | ति | रा | क्ष | से | न्द्र | |
| ने | न्द्रा | रि | बा | णा | भि | ह | तो | हि | क | श्चि | |
| त्प्रा | णा | न्स | म | र्थः | स | म | रे | ऽभि | ध | र्तुम् | |
| त | त | ज | ग | ग | |||||||