स बाणवर्षैरभिवर्ष्यमाणो; धारानिपातानिव तान्विचिन्त्य ।
समीक्षमाणः परमाद्भुतश्री; रामस्तदा लक्ष्मणमित्युवाच ॥
स बाणवर्षैरभिवर्ष्यमाणो; धारानिपातानिव तान्विचिन्त्य ।
समीक्षमाणः परमाद्भुतश्री; रामस्तदा लक्ष्मणमित्युवाच ॥
अन्वयः
परमाद्भुतश्रीः most wonderful and prosperous, सःरामः that Rama, बाणवर्षैः rain of arrows, अभिवर्ष्यमाणः while continuing to rain, तान् them, धारानिपातानिन like rain of water drops, अच्नित्य not minding, समीक्षमाणः was looking at, ततः that, लक्ष्मणम् Lakshman, इति this, उवाच spoke.M N Dutt
And showered with those vollies of arrows, Rāma, without heeding that discharge resembling a very downpour, reflecting, spoke to Laksmana.Summary
Most wonderful and prosperous Rama, looking at the rain of arrows continuing to shower, not minding it as if they are rain of water drops, spoke this to Lakshmana.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| बाणवर्षैर् | बाण–वर्ष (३.३) |
| अभिवर्ष्यमाणो | अभिवर्ष्यमाण (√अभि-वर्षय् + शानच्, १.१) |
| धारानिपातान् | धारा–निपात (२.३) |
| इव | इव (अव्ययः) |
| तान् | तद् (२.३) |
| विचिन्त्य | विचिन्त्य (√वि-चिन्तय् + ल्यप्) |
| समीक्षमाणः | समीक्षमाण (√सम्-ईक्ष् + शानच्, १.१) |
| परमाद्भुतश्री | परम–अद्भुत–श्री (१.१) |
| रामस्तदा | राम (१.१)–तदा (अव्ययः) |
| लक्ष्मणम् | लक्ष्मण (२.१) |
| इत्युवाच | इति (अव्ययः)–उवाच (√वच् लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | बा | ण | व | र्षै | र | भि | व | र्ष्य | मा | णो |
| धा | रा | नि | पा | ता | नि | व | ता | न्वि | चि | न्त्य |
| स | मी | क्ष | मा | णः | प | र | मा | द्भु | त | श्री |
| रा | म | स्त | दा | ल | क्ष्म | ण | मि | त्यु | वा | च |