स पुच्छमुद्यम्य भुजंगकल्पं; विनम्य पृष्ठं श्रवणे निकुञ्च्य ।
विवृत्य वक्त्रं वडवामुखाभ;मापुप्लुवे व्योम्नि स चण्डवेगः ॥
स पुच्छमुद्यम्य भुजंगकल्पं; विनम्य पृष्ठं श्रवणे निकुञ्च्य ।
विवृत्य वक्त्रं वडवामुखाभ;मापुप्लुवे व्योम्नि स चण्डवेगः ॥
अन्वयः
सः he, भुजङ्गकल्पम् resembling a serpent, पुच्छम् bending his back, उद्यम्य raising, पृष्ठम् tail, विनम्य bent down, श्रवणे ears, निकुञ्च्य bending, बडबामुखाभम् opening widely, वक्त्रम् mouth, विवृत्य expounded, निचण्डवेगः terrible speed, व्योम्नि sky, आपुफ्लुवे sprang up.M N Dutt
Then upraising his tail resembling a serpent, bending his back, contracting his ears, and opening his mouth looking like that of a mare, that one possessed of terrific impetuosity, bounded into the sky.Summary
Raising his tail which resembled a serpent, bending his back, and ears, opening his mouth wide expounded Hanuman sprang up at terrific speed.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| पुच्छम् | पुच्छ (२.१) |
| उद्यम्य | उद्यम्य (√उत्-यम् + ल्यप्) |
| भुजंगकल्पं | भुजंग–कल्प (२.१) |
| विनम्य | विनम्य (√वि-नम् + ल्यप्) |
| पृष्ठं | पृष्ठ (२.१) |
| श्रवणे | श्रवण (२.२) |
| निकुञ्च्य | निकुञ्च्य (√नि-कुञ्च् + ल्यप्) |
| विवृत्य | विवृत्य (√वि-वृ + ल्यप्) |
| वक्त्रं | वक्त्र (२.१) |
| वडवामुखाभम् | वडबामुख–आभ (२.१) |
| आपुप्लुवे | आपुप्लुवे (√आ-प्लु लिट् प्र.पु. एक.) |
| व्योम्नि | व्योमन् (७.१) |
| स | तद् (१.१) |
| चण्डवेगः | चण्ड–वेग (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | पु | च्छ | मु | द्य | म्य | भु | जं | ग | क | ल्पं |
| वि | न | म्य | पृ | ष्ठं | श्र | व | णे | नि | कु | ञ्च्य |
| वि | वृ | त्य | व | क्त्रं | व | ड | वा | मु | खा | भ |
| मा | पु | प्लु | वे | व्यो | म्नि | स | च | ण्ड | वे | गः |