स तं समीक्ष्यानलरश्मिदीप्तं; विसिष्मिये वासवदूतसूनुः ।
आप्लुत्य तं चौषधिपर्वतेन्द्रं; तत्रौषधीनां विचयं चकार ॥
स तं समीक्ष्यानलरश्मिदीप्तं; विसिष्मिये वासवदूतसूनुः ।
आप्लुत्य तं चौषधिपर्वतेन्द्रं; तत्रौषधीनां विचयं चकार ॥
अन्वयः
सः he, अनलरश्मिदीप्तम् blazing like fire, तम् those, समीक्ष्य observed, विसिष्मिये astonished, ओषधिपर्वतेन्द्रम् mountain filled with herbs, आवृत्य going round, तत्र there, ओषधीनाम् names of herbs, विचयम् thinking, चकार went.M N Dutt
Beholding that flaming mass of fire, the offspring of Vasava's* emissary wondered. And bounding up to the lord of medicinal mountains, he fell to searching for the drugs. * The emissary of Vāsavain his cloud-from is the wind driving the cloud; and the passage refers to Hanuman,Summary
Observing the herbs blazing like fire, he was astonished at the herbs on the mountain and went round thinking of the names of herbs (asked by Jambavan).पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| तं | तद् (२.१) |
| समीक्ष्यानलरश्मिदीप्तं | समीक्ष्य (√सम्-ईक्ष् + ल्यप्)–अनल–रश्मि–दीप्त (√दीप् + क्त, २.१) |
| विसिष्मिये | विसिष्मिये (√वि-स्मि लिट् प्र.पु. एक.) |
| वासवदूतसूनुः | वासव–दूत–सूनु (१.१) |
| आप्लुत्य | आप्लुत्य (√आ-प्लु + ल्यप्) |
| तं | तद् (२.१) |
| चौषधिपर्वतेन्द्रं | च (अव्ययः)–औषधि–पर्वत–इन्द्र (२.१) |
| तत्रौषधीनां | तत्र (अव्ययः)–ओषधि (६.३) |
| विचयं | विचय (२.१) |
| चकार | चकार (√कृ लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | तं | स | मी | क्ष्या | न | ल | र | श्मि | दी | प्तं |
| वि | सि | ष्मि | ये | वा | स | व | दू | त | सू | नुः |
| आ | प्लु | त्य | तं | चौ | ष | धि | प | र्व | ते | न्द्रं |
| त | त्रौ | ष | धी | नां | वि | च | यं | च | का | र |