स ता महात्मा हनुमानपश्यं;श्चुकोप कोपाच्च भृशं ननाद ।
अमृष्यमाणोऽग्निनिकाशचक्षु;र्महीधरेन्द्रं तमुवाच वाक्यम् ॥
स ता महात्मा हनुमानपश्यं;श्चुकोप कोपाच्च भृशं ननाद ।
अमृष्यमाणोऽग्निनिकाशचक्षु;र्महीधरेन्द्रं तमुवाच वाक्यम् ॥
अन्वयः
महात्मा great soul, सःहनुमान् that Hanuman, ताः those, अपश्यन् not able to see, चुकोप became angry, कोपात् in anger, भृशम् jumping up, ननाद च roared, अनगिनिकाशचक्षुः eyes burning like like, अमृष्यमाणः , तम् , महीधरेन्द्रम् to the lordly mountain, वाक्यम् words, उवाच said.Summary
The great soul Hanuman was not able to see, those herbs, became angry and his eyes were burning like fire in anger. He jumped up and roared and said to the lordly mountain.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| ता | तद् (२.३) |
| महात्मा | महात्मन् (१.१) |
| हनुमान् | हनुमन्त् (१.१) |
| अपश्यंश् | अपश्यत् (१.१) |
| चुकोप | चुकोप (√कुप् लिट् प्र.पु. एक.) |
| कोपाच्च | कोप (५.१)–च (अव्ययः) |
| भृशं | भृशम् (अव्ययः) |
| ननाद | ननाद (√नद् लिट् प्र.पु. एक.) |
| अमृष्यमाणो | अमृष्यमाण (१.१) |
| ऽग्निनिकाशचक्षुर् | अग्नि–निकाश–चक्षुस् (१.१) |
| महीधरेन्द्रं | महीधर–इन्द्र (२.१) |
| तम् | तद् (२.१) |
| उवाच | उवाच (√वच् लिट् प्र.पु. एक.) |
| वाक्यम् | वाक्य (२.१) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | ता | म | हा | त्मा | ह | नु | मा | न | प | श्यं |
| श्चु | को | प | को | पा | च्च | भृ | शं | न | ना | द |
| अ | मृ | ष्य | मा | णो | ऽग्नि | नि | का | श | च | क्षु |
| र्म | ही | ध | रे | न्द्रं | त | मु | वा | च | वा | क्यम् |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||