स तस्य शृङ्गं सनगं सनागं; सकाञ्चनं धातुसहस्रजुष्टम् ।
विकीर्णकूटं चलिताग्रसानुं; प्रगृह्य वेगात्सहसोन्ममाथ ॥
स तस्य शृङ्गं सनगं सनागं; सकाञ्चनं धातुसहस्रजुष्टम् ।
विकीर्णकूटं चलिताग्रसानुं; प्रगृह्य वेगात्सहसोन्ममाथ ॥
अन्वयः
सः he, तस्य its, सनगम् trees, सनागम् elephants, सकाञ्चनम् with gold mines, धातुसहस्रजुष्टम् thousands of minerals, विकीर्णकूटम् crushed projections, ज्वलिताग्रसानुम् set fire and burn the peaks, शृङ्गम् peak, प्रगृह्य seizing, साहसा vehemently, वेगात् swiftly, उन्ममाथ uprooted.M N Dutt
And (anon) on a sudden, he violently rooted up its summit with trees and elephants and gold, and furnished with thousand varieties of ore, having its tops torn and its slopes aflame.Summary
Seizing hold of the peaks vehemently, its trees, elephants, gold mines withthousands of minerals he crushed the projections and set fire and burnt and uprooted swiftly.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| तस्य | तद् (६.१) |
| शृङ्गं | शृङ्ग (२.१) |
| सनगं | स (अव्ययः)–नग (२.१) |
| सनागं | स (अव्ययः)–नाग (२.१) |
| सकाञ्चनं | स (अव्ययः)–काञ्चन (२.१) |
| धातुसहस्रजुष्टम् | धातु–सहस्र–जुष्ट (√जुष् + क्त, २.१) |
| विकीर्णकूटं | विकीर्ण (√वि-कृ + क्त)–कूट (२.१) |
| चलिताग्रसानुं | चलित (√चल् + क्त)–अग्र–सानु (२.१) |
| प्रगृह्य | प्रगृह्य (√प्र-ग्रह् + ल्यप्) |
| वेगात् | वेग (५.१) |
| सहसोन्ममाथ | सहस् (३.१)–उन्ममाथ (√उत्-मथ् लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | त | स्य | शृ | ङ्गं | स | न | गं | स | ना | गं |
| स | का | ञ्च | नं | धा | तु | स | ह | स्र | जु | ष्टम् |
| वि | की | र्ण | कू | टं | च | लि | ता | ग्र | सा | नुं |
| प्र | गृ | ह्य | वे | गा | त्स | ह | सो | न्म | मा | थ |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||