स तद्दुरात्मा सुहृदा निवेदितं; वचः सुधर्म्यं प्रतिगृह्य रावणः ।
गृहं जगामाथ ततश्च वीर्यवा;न्पुनः सभां च प्रययौ सुहृद्वृतः ॥
स तद्दुरात्मा सुहृदा निवेदितं; वचः सुधर्म्यं प्रतिगृह्य रावणः ।
गृहं जगामाथ ततश्च वीर्यवा;न्पुनः सभां च प्रययौ सुहृद्वृतः ॥
M N Dutt
Thus exhorted by his friend, the untighteous Rāvana accepted his virtuous speech; and then that powerful one went (back) to his house, and, surrounded by his friends, entered the court.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| तद् | तद् (२.१) |
| दुरात्मा | दुरात्मन् (१.१) |
| सुहृदा | सुहृद् (३.१) |
| निवेदितं | निवेदित (√नि-वेदय् + क्त, २.१) |
| वचः | वचस् (२.१) |
| सुधर्म्यं | सु (अव्ययः)–धर्म्य (२.१) |
| प्रतिगृह्य | प्रतिगृह्य (√प्रति-ग्रह् + ल्यप्) |
| रावणः | रावण (१.१) |
| गृहं | गृह (२.१) |
| जगामाथ | जगाम (√गम् लिट् प्र.पु. एक.)–अथ (अव्ययः) |
| ततश्च | ततस् (अव्ययः)–च (अव्ययः) |
| वीर्यवान् | वीर्यवत् (१.१) |
| पुनः | पुनर् (अव्ययः) |
| सभां | सभा (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| प्रययौ | प्रययौ (√प्र-या लिट् प्र.पु. एक.) |
| सुहृद्वृतः | सुहृद्–वृत (√वृ + क्त, १.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | त | द्दु | रा | त्मा | सु | हृ | दा | नि | वे | दि | तं |
| व | चः | सु | ध | र्म्यं | प्र | ति | गृ | ह्य | रा | व | णः |
| गृ | हं | ज | गा | मा | थ | त | त | श्च | वी | र्य | वा |
| न्पु | नः | स | भां | च | प्र | य | यौ | सु | हृ | द्वृ | तः |
| ज | त | ज | र | ||||||||