ननु त्वमिषुभिः क्रुद्धो भिन्द्याः कालान्तकावपि ।
मन्दरस्यापि शृङ्गाणि किं पुनर्लक्ष्मणं रणे ॥
ननु त्वमिषुभिः क्रुद्धो भिन्द्याः कालान्तकावपि ।
मन्दरस्यापि शृङ्गाणि किं पुनर्लक्ष्मणं रणे ॥
अन्वयः
क्रुद्धः angry, त्वम् you, इषुभिः arrows, कालान्तकौअपि like time spirit, मन्दरस्य Mandara mountain, शृङ्गाण्यपि the peak of, भिन्द्याः will pierce, ननुयुधि in battle, लक्ष्मणम् Lakshmana, किंपुनः why againM N Dutt
Doubtless, you enraged could pierce with you arrows the Destroyer of Time himself, and the summit of Mandāra, what shall I say of Laks mana in encounted?Summary
'When angry, you could pierce with arrows even the time spirit or peak of Mandara mountain, why to speak of Lakshmana again'?पदच्छेदः
| ननु | ननु (अव्ययः) |
| त्वम् | त्वद् (१.१) |
| इषुभिः | इषु (३.३) |
| क्रुद्धो | क्रुद्ध (√क्रुध् + क्त, १.१) |
| भिन्द्याः | भिन्द्याः (√भिद् विधिलिङ् म.पु. ) |
| कालान्तकावपि | काल–अन्तक (२.२)–अपि (अव्ययः) |
| मन्दरस्यापि | मन्दर (६.१)–अपि (अव्ययः) |
| शृङ्गाणि | शृङ्ग (२.३) |
| किं | क (१.१) |
| पुनर् | पुनर् (अव्ययः) |
| लक्ष्मणं | लक्ष्मण (२.१) |
| रणे | रण (७.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | नु | त्व | मि | षु | भिः | क्रु | द्धो |
| भि | न्द्याः | का | ला | न्त | का | व | पि |
| म | न्द | र | स्या | पि | शृ | ङ्गा | णि |
| किं | पु | न | र्ल | क्ष्म | णं | र | णे |