तामपि प्रहितां शक्तिं रावणेन बलीयसा ।
यत्नतस्ते हरिश्रेष्ठा न शेकुरवमर्दितुम् ।
अर्दिताश्चैव बाणौघैः क्षिप्रहस्तेन रक्षसा ॥
तामपि प्रहितां शक्तिं रावणेन बलीयसा ।
यत्नतस्ते हरिश्रेष्ठा न शेकुरवमर्दितुम् ।
अर्दिताश्चैव बाणौघैः क्षिप्रहस्तेन रक्षसा ॥
अन्वयः
रक्षसा Rakshasa, क्षिप्रहस्तेन released from his hand, बाणौघैः by the arrows, अर्दिताःचैव pained, ते they, हरिश्रेष्ठाः best of Vanaras, बलीयसा with great strength, रावणेन by Ravana, प्रहिताम् discharged, ताम् them, शक्तिम् javelin, यत्नतःअपि effort also, अवमर्दितुम् to pull out, न शेकुः not feasibleM N Dutt
In spite of all their efforts, the foremost monkeys failed to extract the dart which had been hurled by the powerful Rāvaņa.Summary
It was not feasible for the best of Vanaras to pull out the javelin (from Lakshmana's body) discharged with great strength from Ravana's hand, despite great efforts.पदच्छेदः
| ताम् | तद् (२.१) |
| अपि | अपि (अव्ययः) |
| प्रहितां | प्रहित (√प्र-हि + क्त, २.१) |
| शक्तिं | शक्ति (२.१) |
| रावणेन | रावण (३.१) |
| बलीयसा | बलीयस् (३.१) |
| यत्नतस्ते | यत्नतस् (अव्ययः)–तद् (१.३) |
| हरिश्रेष्ठा | हरि–श्रेष्ठ (१.३) |
| न | न (अव्ययः) |
| शेकुर् | शेकुः (√शक् लिट् प्र.पु. बहु.) |
| अवमर्दितुम् | अवमर्दितुम् (√अव-मृद् + तुमुन्) |
| अर्दिताश्चैव | अर्दित (√अर्दय् + क्त, १.३)–च (अव्ययः)–एव (अव्ययः) |
| बाणौघैः | बाण–ओघ (३.३) |
| क्षिप्रहस्तेन | क्षिप्र–हस्त (३.१) |
| रक्षसा | रक्षस् (३.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | म | पि | प्र | हि | तां | श | क्तिं | रा | व | णे | न |
| ब | ली | य | सा | य | त्न | त | स्ते | ह | रि | श्रे | ष्ठा |
| न | शे | कु | र | व | म | र्दि | तुम् | अ | र्दि | ता | श्चै |
| व | बा | णौ | घैः | क्षि | प्र | ह | स्ते | न | र | क्ष | सा |