स कीर्यमाणः शरजालवृष्टिभि;र्महात्मना दीप्तधनुष्मतार्दितः ।
भयात्प्रदुद्राव समेत्य रावणो; यथानिलेनाभिहतो बलाहकः ॥
स कीर्यमाणः शरजालवृष्टिभि;र्महात्मना दीप्तधनुष्मतार्दितः ।
भयात्प्रदुद्राव समेत्य रावणो; यथानिलेनाभिहतो बलाहकः ॥
M N Dutt
Then even as clouds disperse on being trampled by the Winds, Ravana, covered with showers of arrowy networks by that high souled one and reduced to sore straits by that one (Rāma) of a glowing bow, fled away in fear.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| कीर्यमाणः | कीर्यमाण (√कृ + शानच्, १.१) |
| शरजालवृष्टिभिर् | शर–जाल–वृष्टि (३.३) |
| महात्मना | महात्मन् (३.१) |
| दीप्तधनुष्मतार्दितः | दीप्त (√दीप् + क्त)–धनुष्मत् (३.१)–अर्दित (√अर्दय् + क्त, १.१) |
| भयात् | भय (५.१) |
| प्रदुद्राव | प्रदुद्राव (√प्र-द्रु लिट् प्र.पु. एक.) |
| समेत्य | समेत्य (√समा-इ + ल्यप्) |
| रावणो | रावण (१.१) |
| यथानिलेनाभिहतो | यथा (अव्ययः)–अनिल (३.१)–अभिहत (√अभि-हन् + क्त, १.१) |
| बलाहकः | बलाहक (१.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | की | र्य | मा | णः | श | र | जा | ल | वृ | ष्टि | भि |
| र्म | हा | त्म | ना | दी | प्त | ध | नु | ष्म | ता | र्दि | तः |
| भ | या | त्प्र | दु | द्रा | व | स | मे | त्य | रा | व | णो |
| य | था | नि | ले | ना | भि | ह | तो | ब | ला | ह | कः |
| ज | त | ज | र | ||||||||