कृष्णवाजिसमायुक्तं युक्तं रौद्रेण वर्चसा ।
तडित्पताकागहनं दर्शितेन्द्रायुधायुधम् ।
शरधारा विमुञ्चन्तं धारासारमिवान्बुदम् ॥
कृष्णवाजिसमायुक्तं युक्तं रौद्रेण वर्चसा ।
तडित्पताकागहनं दर्शितेन्द्रायुधायुधम् ।
शरधारा विमुञ्चन्तं धारासारमिवान्बुदम् ॥
पदच्छेदः
| कृष्णवाजिसमायुक्तं | कृष्ण–वाजिन्–समायुक्त (√समा-युज् + क्त, २.१) |
| युक्तं | युक्त (√युज् + क्त, २.१) |
| रौद्रेण | रौद्र (३.१) |
| वर्चसा | वर्चस् (३.१) |
| तडित्पताकागहनं | तडित्–पताका–गहन (२.१) |
| दर्शितेन्द्रायुधायुधम् | दर्शित (√दर्शय् + क्त)–इन्द्रायुध–आयुध (२.१) |
| शरधारा | शर–धारा (२.३) |
| विमुञ्चन्तं | विमुञ्चत् (√वि-मुच् + शतृ, २.१) |
| धारासारम् | धारा–सार (२.१) |
| इवाम्बुदम् | इव (अव्ययः)–अम्बुद (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ | ष्ण | वा | जि | स | मा | यु | क्तं | यु | क्तं | रौ | द्रे |
| ण | व | र्च | सा | त | डि | त्प | ता | का | ग | ह | नं |
| द | र्शि | ते | न्द्रा | यु | धा | यु | धम् | श | र | धा | रा |
| वि | मु | ञ्च | न्तं | धा | रा | सा | र | मि | वा | न्बु | दम् |