ततस्तु सुग्रीवविभीषणादयः; सुहृद्विशेषाः सहलक्ष्मणास्तदा ।
समेत्य हृष्टा विजयेन राघवं; रणेऽभिरामं विधिनाभ्यपूजयन् ॥
ततस्तु सुग्रीवविभीषणादयः; सुहृद्विशेषाः सहलक्ष्मणास्तदा ।
समेत्य हृष्टा विजयेन राघवं; रणेऽभिरामं विधिनाभ्यपूजयन् ॥
अन्वयः
ततः then, सुहृद्विशिष्टाः coming together, सहलक्ष्मणाः accompanied by Lakshmana, सुग्रीवविभीषणाङ्गदाः Sugriva, Vibheeshana, and Angada, रणे in the battle, विजयेन by the victory, हृष्टाः happy, अभिरामम् charming, रामम् Rama, समेत्य friends together, तदा then, विधिना as tradition goes, अभ्यपूजयन् offered prayersM N Dutt
Thereupon Sugrīva Vibhișana and Lakşmaņa, welcomed Rāma, of unmitigated prowess singing his glory.Summary
Then all of them (hosts of gods) coming together, accompanied by Lakshmana, Sugriva, Vibheeshana, and Angada along with other friends, happy about the victory in the battle offered prayers to charming Sri Rama in accordance with tradition.पदच्छेदः
| ततस्तु | ततस् (अव्ययः)–तु (अव्ययः) |
| सुग्रीवविभीषणादयः | सुग्रीव–विभीषण–आदि (१.३) |
| सुहृद्विशेषाः | सुहृद्–विशेष (१.३) |
| सहलक्ष्मणास्तदा | सह (अव्ययः)–लक्ष्मण (१.३)–तदा (अव्ययः) |
| समेत्य | समेत्य (√समा-इ + ल्यप्) |
| हृष्टा | हृष्ट (√हृष् + क्त, १.३) |
| विजयेन | विजय (३.१) |
| राघवं | राघव (२.१) |
| रणे | रण (७.१) |
| ऽभिरामं | अभिरामम् (अव्ययः) |
| विधिनाभ्यपूजयन् | विधि (३.१)–अभ्यपूजयन् (√अभि-पूजय् लङ् प्र.पु. बहु.) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त | स्तु | सु | ग्री | व | वि | भी | ष | णा | द | यः |
| सु | हृ | द्वि | शे | षाः | स | ह | ल | क्ष्म | णा | स्त | दा |
| स | मे | त्य | हृ | ष्टा | वि | ज | ये | न | रा | घ | वं |
| र | णे | ऽभि | रा | मं | वि | धि | ना | भ्य | पू | ज | यन् |
| ज | त | ज | र | ||||||||