पदच्छेदः
| हुतानि | हुत (√हु + क्त, १.३) |
| यानि | यद् (१.३) |
| शीर्षाणि | शीर्ष (१.३) |
| पूर्वम् | पूर्वम् (अव्ययः) |
| अग्नौ | अग्नि (७.१) |
| त्वयानघ | त्वद् (३.१)–अनघ (८.१) |
| पुनस्तानि | पुनर् (अव्ययः)–तद् (१.३) |
| भविष्यन्ति | भविष्यन्ति (√भू लृट् प्र.पु. बहु.) |
| तथैव | तथा (अव्ययः)–एव (अव्ययः) |
| तव | त्वद् (६.१) |
| राक्षस | राक्षस (८.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| हु | ता | नि | या | नि | शी | र्षा | णि |
| पू | र्व | म | ग्नौ | त्व | या | न | घ |
| पु | न | स्ता | नि | भ | वि | ष्य | न्ति |
| त | थै | व | त | व | रा | क्ष | स |