प्रजापतिस्तु तां प्राप्तां प्राह वाक्यं सरस्वतीम् ।
वाणि त्वं राक्षसेन्द्रस्य भव या देवतेप्सिता ॥
प्रजापतिस्तु तां प्राप्तां प्राह वाक्यं सरस्वतीम् ।
वाणि त्वं राक्षसेन्द्रस्य भव या देवतेप्सिता ॥
M N Dutt
And the lord of creatures, on having her, spoke to Sarasvatī,' O Vāņi!' be you the goddess of speech of this foremost of Rākşasas, favourable to the deities. १. Lit. word, a designation of Saraswati. २. i.e. preside over Kumbhakarna's speech while asking for the boon, and let him, through your power, ask for such a gift as may turn our profitable to the gods.पदच्छेदः
| प्रजापतिस्तु | प्रजापति (१.१)–तु (अव्ययः) |
| तां | तद् (२.१) |
| प्राप्तां | प्राप्त (√प्र-आप् + क्त, २.१) |
| प्राह | प्राह (√प्र-अह् लिट् प्र.पु. एक.) |
| वाक्यं | वाक्य (२.१) |
| सरस्वतीम् | सरस्वती (२.१) |
| वाणि | वाणी (८.१) |
| त्वं | त्वद् (१.१) |
| राक्षसेन्द्रस्य | राक्षस–इन्द्र (६.१) |
| भव | भव (√भू लोट् म.पु. ) |
| या | यद् (१.१) |
| देवतेप्सिता | देवता (१.१)–ईप्सित (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | जा | प | ति | स्तु | तां | प्रा | प्तां |
| प्रा | ह | वा | क्यं | स | र | स्व | तीम् |
| वा | णि | त्वं | रा | क्ष | से | न्द्र | स्य |
| भ | व | या | दे | व | ते | प्सि | ता |