पदच्छेदः
| तत्राहम् | तत्र (अव्ययः)–मद् (१.१) |
| अरतिं | अरति (२.१) |
| विन्दंस्तया | विन्दत् (√विद् + शतृ, ८.१)–तद् (३.१) |
| हीनः | हीन (√हा + क्त, १.१) |
| सुदुःखितः | सु (अव्ययः)–दुःखित (१.१) |
| तस्मात् | तद् (५.१) |
| पुराद् | पुर (५.१) |
| दुहितरं | दुहितृ (२.१) |
| गृहीत्वा | गृहीत्वा (√ग्रह् + क्त्वा) |
| वनम् | वन (२.१) |
| आगतः | आगत (√आ-गम् + क्त, १.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त्रा | ह | म | र | तिं | वि | न्दं |
| स्त | या | ही | नः | सु | दुः | खि | तः |
| त | स्मा | त्पु | रा | द्दु | हि | त | रं |
| गृ | ही | त्वा | व | न | मा | ग | तः |