संशयश्च रणे नित्यं राक्षसश्चैष दुर्जयः ।
स निवृत्तो गुरोर्वाक्यान्मरुत्तः पृथिवीपतिः ।
विसृज्य सशरं चापं स्वस्थो मखमुखोऽभवत् ॥
संशयश्च रणे नित्यं राक्षसश्चैष दुर्जयः ।
स निवृत्तो गुरोर्वाक्यान्मरुत्तः पृथिवीपतिः ।
विसृज्य सशरं चापं स्वस्थो मखमुखोऽभवत् ॥
पदच्छेदः
| संशयश्च | संशय (१.१)–च (अव्ययः) |
| रणे | रण (७.१) |
| नित्यं | नित्यम् (अव्ययः) |
| राक्षसश्चैष | राक्षस (१.१)–च (अव्ययः)–एतद् (१.१) |
| दुर्जयः | दुर्जय (१.१) |
| स | तद् (१.१) |
| निवृत्तो | निवृत्त (√नि-वृत् + क्त, १.१) |
| गुरोर् | गुरु (६.१) |
| वाक्यान्मरुत्तः | वाक्य (५.१)–मरुत्त (१.१) |
| पृथिवीपतिः | पृथिवीपति (१.१) |
| विसृज्य | विसृज्य (√वि-सृज् + ल्यप्) |
| सशरं | स (अव्ययः)–शर (२.१) |
| चापं | चाप (२.१) |
| स्वस्थो | स्वस्थ (१.१) |
| मखमुखो | मख–मुख (१.१) |
| ऽभवत् | अभवत् (√भू लङ् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | श | य | श्च | र | णे | नि | त्यं | रा | क्ष | स | श्चै |
| ष | दु | र्ज | यः | स | नि | वृ | त्तो | गु | रो | र्वा | क्या |
| न्म | रु | त्तः | पृ | थि | वी | प | तिः | वि | सृ | ज्य | स |
| श | रं | चा | पं | स्व | स्थो | म | ख | मु | खो | ऽभ | वत् |