ये च मद्विषयस्थास्तु मानवाः क्षुधयार्दिताः ।
त्वयि भुक्ते तु तृप्तास्ते भविष्यन्ति सबान्धवाः ॥
ये च मद्विषयस्थास्तु मानवाः क्षुधयार्दिताः ।
त्वयि भुक्ते तु तृप्तास्ते भविष्यन्ति सबान्धवाः ॥
M N Dutt
Those men residing in my dominion, being smitten with hunger, shall be refreshed along with your relations, when you have eaten and been refreshed.पदच्छेदः
| ये | यद् (१.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| मद्विषयस्थास्तु | मद्–विषय–स्थ (१.३)–तु (अव्ययः) |
| मानवाः | मानव (१.३) |
| क्षुधयार्दिताः | क्षुधा (३.१)–अर्दित (√अर्दय् + क्त, १.३) |
| त्वयि | त्वद् (७.१) |
| भुक्ते | भुक्त (√भुज् + क्त, ७.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| तृप्तास्ते | तृप्त (√तृप् + क्त, १.३)–तद् (१.३) |
| भविष्यन्ति | भविष्यन्ति (√भू लृट् प्र.पु. बहु.) |
| सबान्धवाः | स (अव्ययः)–बान्धव (१.३) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ये | च | म | द्वि | ष | य | स्था | स्तु |
| मा | न | वाः | क्षु | ध | या | र्दि | ताः |
| त्व | यि | भु | क्ते | तु | तृ | प्ता | स्ते |
| भ | वि | ष्य | न्ति | स | बा | न्ध | वाः |