परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते गुणानां संपदा भृशम् ।
तस्मात्ते विरमाम्यद्य पुत्रमात्मसमं गुणैः ।
उभयोर्वंशकर्तारं पौलस्त्य इति विश्रुतम् ॥
परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते गुणानां संपदा भृशम् ।
तस्मात्ते विरमाम्यद्य पुत्रमात्मसमं गुणैः ।
उभयोर्वंशकर्तारं पौलस्त्य इति विश्रुतम् ॥
M N Dutt
'O you of shapely hips, well-pleased am I with you with your wealth of worth, and therefore, O exalted one, I will today confer on you a son like to yourself, who will perpetuate both the lines*-being celebrated as Paulastya. *(i.e. maternal and paternal lines.)पदच्छेदः
| परितुष्टो | परितुष्ट (√परि-तुष् + क्त, १.१) |
| ऽस्मि | अस्मि (√अस् लट् उ.पु. ) |
| भद्रं | भद्र (१.१) |
| ते | त्वद् (६.१) |
| गुणानां | गुण (६.३) |
| संपदा | सम्पद् (३.१) |
| भृशम् | भृशम् (अव्ययः) |
| तस्मात् | तस्मात् (अव्ययः) |
| ते | त्वद् (६.१) |
| विरमाम्यद्य | विरमामि (√वि-रम् लट् उ.पु. )–अद्य (अव्ययः) |
| पुत्रम् | पुत्र (२.१) |
| आत्मसमं | आत्मन्–सम (२.१) |
| गुणैः | गुण (३.३) |
| उभयोर् | उभय (६.२) |
| वंशकर्तारं | वंश–कर्तृ (२.१) |
| पौलस्त्य | पौलस्त्य (१.१) |
| इति | इति (अव्ययः) |
| विश्रुतम् | विश्रुत (√वि-श्रु + क्त, २.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रि | तु | ष्टो | ऽस्मि | भ | द्रं | ते | गु | णा | नां | सं |
| प | दा | भृ | शम् | त | स्मा | त्ते | वि | र | मा | म्य | द्य |
| पु | त्र | मा | त्म | स | मं | गु | णैः | उ | भ | यो | र्वं |
| श | क | र्ता | रं | पौ | ल | स्त्य | इ | ति | वि | श्रु | तम् |