M N Dutt
How can this lord of Raksasas, of himself, go to him who, resembling another fire, bear to the gifts and acts (of persons), that high-souled one of whom attaining consciousness, people put forth their activity; and; afflicted with the fear of whom these three worlds fall away?
पदच्छेदः
| यस्य | यद् (६.१) |
| नित्यं | नित्यम् (अव्ययः) |
| त्रयो | त्रि (१.३) |
| लोका | लोक (१.३) |
| विद्रवन्ति | विद्रवन्ति (√वि-द्रु लट् प्र.पु. बहु.) |
| भयार्दिताः | भय–अर्दित (√अर्दय् + क्त, १.३) |
| तं | तद् (२.१) |
| कथं | कथम् (अव्ययः) |
| राक्षसेन्द्रो | राक्षस–इन्द्र (१.१) |
| ऽसौ | अदस् (१.१) |
| स्वयम् | स्वयम् (अव्ययः) |
| एवाभिगच्छति | एव (अव्ययः)–अभिगच्छति (√अभि-गम् लट् प्र.पु. एक.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| य | स्य | नि | त्यं | त्र | यो | लो | का |
| वि | द्र | व | न्ति | भ | या | र्दि | ताः |
| तं | क | थं | रा | क्ष | से | न्द्रो | ऽसौ |
| स्व | य | मे | वा | भि | ग | च्छ | ति |