M N Dutt
And even as Vişnu had pleased me by destroying the Daityas, you pleased me by harassing the Gandharvas and serpents.पदच्छेदः
| विष्णुना | विष्णु (३.१) |
| दैत्यघातैश्च | दैत्य–घात (३.३)–च (अव्ययः) |
| तार्क्ष्यस्योरगधर्षणैः | तार्क्ष्य (६.१)–उरग–धर्षण (३.३) |
| त्वया | त्वद् (३.१) |
| समरमर्दैश्च | समर–मर्द (३.३)–च (अव्ययः) |
| भृशं | भृशम् (अव्ययः) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| परितोषितः | परितोषित (√परि-तोषय् + क्त, १.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ष्णु | ना | दै | त्य | घा | तै | श्च |
| ता | र्क्ष्य | स्यो | र | ग | ध | र्ष | णैः |
| त्व | या | स | म | र | म | र्दै | श्च |
| भृ | शं | हि | प | रि | तो | षि | तः |