M N Dutt
Seeing the Maharși Nārada arrive there, Yama offering him arghya according to the ordinance, addressed him saying, when he was seated at his case:
पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा) |
| यमः | यम (१.१) |
| प्राप्तं | प्राप्त (√प्र-आप् + क्त, २.१) |
| महर्षिं | महत्–ऋषि (२.१) |
| तत्र | तत्र (अव्ययः) |
| नारदम् | नारद (२.१) |
| अब्रवीत् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
| सुखम् | सुखम् (अव्ययः) |
| आसीनम् | आसीन (√आस् + क्त, २.१) |
| अर्घ्यम् | अर्घ्य (२.१) |
| आवेद्य | आवेद्य (√आ-वेदय् + ल्यप्) |
| धर्मतः | धर्म (५.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| स | तु | दृ | ष्ट्वा | य | मः | प्रा | प्तं |
| म | ह | र्षिं | त | त्र | ना | र | दम् |
| अ | ब्र | वी | त्सु | ख | मा | सी | न |
| म | र्घ्य | मा | वे | द्य | ध | र्म | तः |