यस्य पार्श्वेषु निश्छिद्राः कालपाशाः प्रतिष्ठिताः ।
पावकस्पर्शसंकाशो मुद्गरो मूर्तिमान्स्थितः ॥
यस्य पार्श्वेषु निश्छिद्राः कालपाशाः प्रतिष्ठिताः ।
पावकस्पर्शसंकाशो मुद्गरो मूर्तिमान्स्थितः ॥
पदच्छेदः
| यस्य | यद् (६.१) |
| पार्श्वेषु | पार्श्व (७.३) |
| निश्छिद्राः | निश्छिद्र (१.३) |
| कालपाशाः | कालपाश (१.३) |
| प्रतिष्ठिताः | प्रतिष्ठित (√प्रति-स्था + क्त, १.३) |
| पावकस्पर्शसंकाशो | पावक–स्पर्श–संकाश (१.१) |
| मुद्गरो | मुद्गर (१.१) |
| मूर्तिमान् | मूर्तिमत् (१.१) |
| स्थितः | स्थित (√स्था + क्त, १.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | स्य | पा | र्श्वे | षु | नि | श्छि | द्राः |
| का | ल | पा | शाः | प्र | ति | ष्ठि | ताः |
| पा | व | क | स्प | र्श | सं | का | शो |
| मु | द्ग | रो | मू | र्ति | मा | न्स्थि | तः |