यस्माच्चन्द्रः प्रभवति शीतरश्मिः प्रजाहितः ।
यं समासाद्य जीवन्ति फेनपाः परमर्षयः ।
अमृतं यत्र चोत्पन्नं सुरा चापि सुराशिनाम् ॥
यस्माच्चन्द्रः प्रभवति शीतरश्मिः प्रजाहितः ।
यं समासाद्य जीवन्ति फेनपाः परमर्षयः ।
अमृतं यत्र चोत्पन्नं सुरा चापि सुराशिनाम् ॥
पदच्छेदः
| यस्माच्चन्द्रः | यद् (५.१)–चन्द्र (१.१) |
| प्रभवति | प्रभवति (√प्र-भू लट् प्र.पु. एक.) |
| शीतरश्मिः | शीतरश्मि (१.१) |
| प्रजाहितः | प्रजा–हित (१.१) |
| यं | यद् (२.१) |
| समासाद्य | समासाद्य (√समा-सादय् + ल्यप्) |
| जीवन्ति | जीवन्ति (√जीव् लट् प्र.पु. बहु.) |
| फेनपाः | फेनप (१.३) |
| परमर्षयः | परम–ऋषि (१.३) |
| अमृतं | अमृत (१.१) |
| यत्र | यत्र (अव्ययः) |
| चोत्पन्नं | च (अव्ययः)–उत्पन्न (√उत्-पद् + क्त, १.१) |
| सुरा | सुरा (१.१) |
| चापि | च (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| सुराशिनाम् | सुरा–आशिन् (६.३) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | स्मा | च्च | न्द्रः | प्र | भ | व | ति | शी | त | र | श्मिः |
| प्र | जा | हि | तः | यं | स | मा | सा | द्य | जी | व | न्ति |
| फे | न | पाः | प | र | म | र्ष | यः | अ | मृ | तं | य |
| त्र | चो | त्प | न्नं | सु | रा | चा | पि | सु | रा | शि | नाम् |