राक्षसेन्द्रस्तु तच्छ्रुत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः ।
हर्षान्नादं विमुञ्चन्वै निष्क्रान्तो वरुणालयात् ॥
राक्षसेन्द्रस्तु तच्छ्रुत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः ।
हर्षान्नादं विमुञ्चन्वै निष्क्रान्तो वरुणालयात् ॥
M N Dutt
Having vanquished him and distinguished his name, Rāvaņa again ascended his Puşpaka and went out of the abode of Yama.पदच्छेदः
| राक्षसेन्द्रस्तु | राक्षस–इन्द्र (१.१)–तु (अव्ययः) |
| तच्छ्रुत्वा | तद् (२.१)–श्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा) |
| नाम | नामन् (२.१) |
| विश्राव्य | विश्राव्य (√वि-श्रावय् + ल्यप्) |
| चात्मनः | च (अव्ययः)–आत्मन् (६.१) |
| हर्षान्नादं | हर्ष (५.१)–नाद (२.१) |
| विमुञ्चन् | विमुञ्चत् (√वि-मुच् + शतृ, १.१) |
| वै | वै (अव्ययः) |
| निष्क्रान्तो | निष्क्रान्त (√निः-क्रम् + क्त, १.१) |
| वरुणालयात् | वरुण–आलय (५.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | क्ष | से | न्द्र | स्तु | त | च्छ्रु | त्वा |
| ना | म | वि | श्रा | व्य | चा | त्म | नः |
| ह | र्षा | न्ना | दं | वि | मु | ञ्च | न्वै |
| नि | ष्क्रा | न्तो | व | रु | णा | ल | यात् |