विभीषणस्तु ता नारीर्दृष्ट्वा शोकसमाकुलाः ।
तस्य तां च मतिं ज्ञात्वा धर्मात्मा वाक्यमब्रवीत् ॥
विभीषणस्तु ता नारीर्दृष्ट्वा शोकसमाकुलाः ।
तस्य तां च मतिं ज्ञात्वा धर्मात्मा वाक्यमब्रवीत् ॥
पदच्छेदः
| विभीषणस्तु | विभीषण (१.१)–तु (अव्ययः) |
| ता | तद् (२.३) |
| नारीर् | नारी (२.३) |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा) |
| शोकसमाकुलाः | शोक–समाकुल (२.३) |
| तस्य | तद् (६.१) |
| तां | तद् (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| मतिं | मति (२.१) |
| ज्ञात्वा | ज्ञात्वा (√ज्ञा + क्त्वा) |
| धर्मात्मा | धर्म–आत्मन् (१.१) |
| वाक्यम् | वाक्य (२.१) |
| अब्रवीत् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | भी | ष | ण | स्तु | ता | ना | री |
| र्दृ | ष्ट्वा | शो | क | स | मा | कु | लाः |
| त | स्य | तां | च | म | तिं | ज्ञा | त्वा |
| ध | र्मा | त्मा | वा | क्य | म | ब्र | वीत् |