M N Dutt
There, he saw, filled with hundreds of sacrificial posts and altars, a sacrifice being celebrated, as if burning in its lustre.
पदच्छेदः
| तत्र | तत्र (अव्ययः) |
| यूपशताकीर्णं | यूप–शत–आकीर्ण (√आ-कृ + क्त, २.१) |
| सौम्यचैत्योपशोभितम् | सौम्य–चैत्य–उपशोभित (√उप-शोभय् + क्त, २.१) |
| ददर्श | ददर्श (√दृश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| विष्ठितं | विष्ठित (√वि-स्था + क्त, २.१) |
| यज्ञं | यज्ञ (२.१) |
| संप्रदीप्तम् | संप्रदीप्त (√संप्र-दीप् + क्त, २.१) |
| इव | इव (अव्ययः) |
| श्रिया | श्री (३.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| त | त्र | यू | प | श | ता | की | र्णं |
| सौ | म्य | चै | त्यो | प | शो | भि | तम् |
| द | द | र्श | वि | ष्ठि | तं | य | ज्ञं |
| सं | प्र | दी | प्त | मि | व | श्रि | या |