पदच्छेदः
| तस्यास्तद् | तद् (६.१)–तद् (२.१) |
| वचनं | वचन (२.१) |
| श्रुत्वा | श्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा) |
| तथेत्याह | तथा (अव्ययः)–इति (अव्ययः)–आह (√अह् लिट् प्र.पु. एक.) |
| मधुर् | मधु (१.१) |
| वचः | वचस् (२.१) |
| ददर्श | ददर्श (√दृश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| राक्षसश्रेष्ठं | राक्षस–श्रेष्ठ (२.१) |
| यथान्यायम् | यथान्यायम् (अव्ययः) |
| उपेत्य | उपेत्य (√उप-इ + ल्यप्) |
| सः | तद् (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्या | स्त | द्व | च | नं | श्रु | त्वा |
| त | थे | त्या | ह | म | धु | र्व | चः |
| द | द | र्श | रा | क्ष | स | श्रे | ष्ठं |
| य | था | न्या | य | मु | पे | त्य | सः |