पदच्छेदः
| गृहीत्वा | गृहीत्वा (√ग्रह् + क्त्वा) |
| तं | तद् (२.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| नप्तारं | नप्तृ (२.१) |
| प्रविष्टः | प्रविष्ट (√प्र-विश् + क्त, १.१) |
| स | तद् (१.१) |
| महोदधिम् | महत्–उदधि (२.१) |
| मातामहो | मातामह (१.१) |
| ऽर्यकस्तस्य | आर्यक (१.१)–तद् (६.१) |
| पौलोमी | पौलोमी (१.१) |
| येन | यद् (३.१) |
| सा | तद् (१.१) |
| शची | शची (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गृ | ही | त्वा | तं | तु | न | प्ता | रं |
| प्र | वि | ष्टः | स | म | हो | द | धिम् |
| मा | ता | म | हो | ऽर्य | क | स्त | स्य |
| पौ | लो | मी | ये | न | सा | श | ची |