ततस्तस्य परिज्ञाय मया स्थैर्यं महामुनेः ।
ज्ञात्वा तपसि सिद्धिं च पत्न्यर्थं स्पर्शिता तदा ॥
ततस्तस्य परिज्ञाय मया स्थैर्यं महामुनेः ।
ज्ञात्वा तपसि सिद्धिं च पत्न्यर्थं स्पर्शिता तदा ॥
M N Dutt
Thereupon considering the patience and accomplished asceticism of Gautama I married her with him.पदच्छेदः
| ततस्तस्य | ततस् (अव्ययः)–तद् (६.१) |
| परिज्ञाय | परिज्ञाय (√परि-ज्ञा + ल्यप्) |
| मया | मद् (३.१) |
| स्थैर्यं | स्थैर्य (२.१) |
| महामुनेः | महत्–मुनि (६.१) |
| ज्ञात्वा | ज्ञात्वा (√ज्ञा + क्त्वा) |
| तपसि | तपस् (७.१) |
| सिद्धिं | सिद्धि (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| पत्न्यर्थं | पत्नी–अर्थ (२.१) |
| स्पर्शिता | स्पर्शित (√स्पर्शय् + क्त, १.१) |
| तदा | तदा (अव्ययः) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त | स्त | स्य | प | रि | ज्ञा | य |
| म | या | स्थै | र्यं | म | हा | मु | नेः |
| ज्ञा | त्वा | त | प | सि | सि | द्धिं | च |
| प | त्न्य | र्थं | स्प | र्शि | ता | त | दा |