एष रश्मिसहस्रेण जगत्कृत्वेव काञ्चनम् ।
तीक्ष्णतापकरः सूर्यो नभसो मध्यमास्थितः ।
मामासीनं विदित्वेह चन्द्रायाति दिवाकरः ॥
एष रश्मिसहस्रेण जगत्कृत्वेव काञ्चनम् ।
तीक्ष्णतापकरः सूर्यो नभसो मध्यमास्थितः ।
मामासीनं विदित्वेह चन्द्रायाति दिवाकरः ॥
पदच्छेदः
| एष | एतद् (१.१) |
| रश्मिसहस्रेण | रश्मि–सहस्र (३.१) |
| जगत् | जगन्त् (२.१) |
| कृत्वेव | कृत्वा (√कृ + क्त्वा)–इव (अव्ययः) |
| काञ्चनम् | काञ्चन (२.१) |
| तीक्ष्णतापकरः | तीक्ष्ण–ताप–कर (१.१) |
| सूर्यो | सूर्य (१.१) |
| नभसो | नभस् (६.१) |
| मध्यम् | मध्य (२.१) |
| आस्थितः | आस्थित (√आ-स्था + क्त, १.१) |
| माम् | मद् (२.१) |
| आसीनं | आसीन (√आस् + क्त, २.१) |
| विदित्वेह | विदित्वा (√विद् + क्त्वा)–इह (अव्ययः) |
| चन्द्रायति | चन्द्रायति (√चन्द्राय् लट् प्र.पु. एक.) |
| दिवाकरः | दिवाकर (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | ष | र | श्मि | स | ह | स्रे | ण | ज | ग | त्कृ | त्वे |
| व | का | ञ्च | नम् | ती | क्ष्ण | ता | प | क | रः | सू | र्यो |
| न | भ | सो | म | ध्य | मा | स्थि | तः | मा | मा | सी | नं |
| वि | दि | त्वे | ह | च | न्द्रा | या | ति | दि | वा | क | रः |