ततस्ते राक्षसाः स्नात्वा नर्मदाया वराम्भसि ।
उत्तीर्य पुष्पाण्याजह्रुर्बल्यर्थं रावणस्य तु ॥
ततस्ते राक्षसाः स्नात्वा नर्मदाया वराम्भसि ।
उत्तीर्य पुष्पाण्याजह्रुर्बल्यर्थं रावणस्य तु ॥
M N Dutt
Thereupon having got up from the waters the highly powerful Rākşasas culled flowers for Ravana's offerings.पदच्छेदः
| ततस्ते | ततस् (अव्ययः)–तद् (१.३) |
| राक्षसाः | राक्षस (१.३) |
| स्नात्वा | स्नात्वा (√स्ना + क्त्वा) |
| नर्मदाया | नर्मदा (६.१) |
| वराम्भसि | वर–अम्भस् (७.१) |
| उत्तीर्य | उत्तीर्य (√उत्-तृ + ल्यप्) |
| पुष्पाण्याजह्रुर् | पुष्प (२.३)–आजह्रुः (√आ-हृ लिट् प्र.पु. बहु.) |
| बल्यर्थं | बलि–अर्थ (२.१) |
| रावणस्य | रावण (६.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त | स्ते | रा | क्ष | साः | स्ना | त्वा |
| न | र्म | दा | या | व | रा | म्भ | सि |
| उ | त्ती | र्य | पु | ष्पा | ण्या | ज | ह्रु |
| र्ब | ल्य | र्थं | रा | व | ण | स्य | तु |