पदच्छेदः
| रावणो | रावण (१.१) |
| राक्षसेन्द्रस्तु | राक्षस–इन्द्र (१.१)–तु (अव्ययः) |
| तस्यामात्यान् | तद् (६.१)–अमात्य (२.३) |
| अपृच्छत | अपृच्छत (√प्रच्छ् लङ् प्र.पु. एक.) |
| क्वार्जुनो | क्व (अव्ययः)–अर्जुन (१.१) |
| वो | त्वद् (६.३) |
| नृपः | नृप (१.१) |
| सो | तद् (१.१) |
| ऽद्य | अद्य (अव्ययः) |
| शीघ्रम् | शीघ्रम् (अव्ययः) |
| आख्यातुम् | आख्यातुम् (√आ-ख्या + तुमुन्) |
| अर्हथ | अर्हथ (√अर्ह् लट् म.पु. द्वि.) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | व | णो | रा | क्ष | से | न्द्र | स्तु |
| त | स्या | मा | त्या | न | पृ | च्छ | त |
| क्वा | र्जु | नो | वो | नृ | पः | सो | ऽद्य |
| शी | घ्र | मा | ख्या | तु | म | र्ह | थ |