तस्य मर्गं समावृत्य विन्ध्योऽर्कस्येव पर्वतः ।
स्थितो विन्ध्य इवाकम्प्यः प्रहस्तो मुसलायुधः ॥
तस्य मर्गं समावृत्य विन्ध्योऽर्कस्येव पर्वतः ।
स्थितो विन्ध्य इवाकम्प्यः प्रहस्तो मुसलायुधः ॥
M N Dutt
Thereupon stood there obstructing his course Raksasa, worked up with anger and with a mace in his hand, like to the Vindhya range standing in the way of the sun.पदच्छेदः
| तस्य | तद् (६.१) |
| मार्गं | मार्ग (२.१) |
| समावृत्य | समावृत्य (√समा-वृ + ल्यप्) |
| विन्ध्यो | विन्ध्य (१.१) |
| ऽर्कस्येव | अर्क (६.१)–इव (अव्ययः) |
| पर्वतः | पर्वत (१.१) |
| स्थितो | स्थित (√स्था + क्त, १.१) |
| विन्ध्य | विन्ध्य (१.१) |
| इवाकम्प्यः | इव (अव्ययः)–अकम्प्य (१.१) |
| प्रहस्तो | प्रहस्त (१.१) |
| मुसलायुधः | मुसल–आयुध (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्य | म | र्गं | स | मा | वृ | त्य |
| वि | न्ध्यो | ऽर्क | स्ये | व | प | र्व | तः |
| स्थि | तो | वि | न्ध्य | इ | वा | क | म्प्यः |
| प्र | ह | स्तो | मु | स | ला | यु | धः |