M N Dutt
You have bound up my invincible son in the conflict at whose fear the wind and the ocean stand still.
पदच्छेदः
| भयाद् | भय (५.१) |
| यस्यावतिष्ठेतां | यद् (६.१)–अवतिष्ठेताम् (√अव-स्था विधिलिङ् प्र.पु. द्वि.) |
| निष्पन्दौ | निष्पन्द (१.२) |
| सागरानिलौ | सागर–अनिल (१.२) |
| सो | तद् (१.१) |
| ऽयम् | इदम् (१.१) |
| अद्य | अद्य (अव्ययः) |
| त्वया | त्वद् (३.१) |
| बद्धः | बद्ध (√बन्ध् + क्त, १.१) |
| पौत्रो | पौत्र (१.१) |
| मे | मद् (६.१) |
| ऽतीवदुर्जयः | अतीव (अव्ययः)–दुर्जय (१.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| भ | या | द्य | स्या | व | ति | ष्ठे | तां |
| नि | ष्प | न्दौ | सा | ग | रा | नि | लौ |
| सो | ऽय | म | द्य | त्व | या | ब | द्धः |
| पौ | त्रो | मे | ऽती | व | दु | र्ज | यः |