पदच्छेदः
| एवम् | एवम् (अव्ययः) |
| एतत् | एतद् (१.१) |
| कपिश्रेष्ठ | कपि–श्रेष्ठ (८.१) |
| भविता | भविता (√भू लुट् प्र.पु. एक.) |
| नात्र | न (अव्ययः)–अत्र (अव्ययः) |
| संशयः | संशय (१.१) |
| लोका | लोक (१.३) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| यावत् | यावत् (अव्ययः) |
| स्थास्यन्ति | स्थास्यन्ति (√स्था लृट् प्र.पु. बहु.) |
| तावत् | तावत् (अव्ययः) |
| स्थास्यति | स्थास्यति (√स्था लृट् प्र.पु. एक.) |
| मे | मद् (६.१) |
| कथा | कथा (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | व | मे | त | त्क | पि | श्रे | ष्ठ |
| भ | वि | ता | ना | त्र | सं | श | यः |
| लो | का | हि | या | व | त्स्था | स्य | न्ति |
| ता | व | त्स्था | स्य | ति | मे | क | था |